Wednesday, October 17, 2007

दो जीवन-समान्तर

सूरज प्रकाश (http://www.raviwar.com/)

- हैलो, क्या मैं इस नम्बर पर दीप्ति जी से बात कर सकता हूं?
- हां, मैं मिसेज धवन ही बात कर रही हूं
- लेकिन मुझे तो दीप्ति जी से बात करनी है
- कहा , मैं ही मिसेज दीप्ति धवन हूंकहिये, क्या कर सकती हूं मैं आपके लिए?
- कैसी हो?
- मैं ठीक हूं, लेकिन आप कौन?
- पहचानो.. ..
- देखिये, मैं पहचान नहीं पा रही हूंपहले आप अपना नाम बताइये और बताइये, क्या काम है मुझसे?
- काम है भी ओर नहीं भी
- देखिये, आप पहेलियां मत बुझाइयेअगर आप अपना नाम और काम नहीं बताते तो मैं फोन रखती हूं
- यह ग़ज़ब मत करना डियर, मेरे पास रुपये का और सिक्का नहीं है
- बहुत बेशरम हैं आपआप को मालूम नहीं है, आप किससे बात कर रहे हैं
- मालूम है तभी तो छूट ले रहा हूं, वरना दीप्ति के गुस्से को मुझसे बेहतर और कौन जानता है
- मिस्टर, आप जो भी हें, बहुत बदतमीज हेंमैं फोन रख रही हूं
- अगर मैं अपनी शराफत का परिचय दे दूं तो?
- तो मुंह से बोलिये तो सहीक्यों मेरा दिमाग खराब किये जा रहे हैं
- यार, एक बार तो कोशिश कर देखो, शायद कोई भूला भटका अपना ही हो इस तरफ
- मैं नहीं पहचान पा रही हूं आवाज़आप ही बताइये
- अच्छा, एक हिंट देता हूं, शायद बात बन जाये
- बोलिये
- आज से बीस बरस पहले 1979 की दिसम्बर की एक सर्द शाम देश की राजधानी दिल्ली में कनॉट प्लेस में रीगल के पास शाम छःबजे आपने किसी भले आदमी को मिलने का टाइम दिया था
- ओह गॉड, तो ये आप हैं जनाबआज.. अचानक.. इतने बरसों के बाद?
- जी हां, यह खाकसार आज भी बीस साल से वहीं खड़ा आपका इंतज़ार कर रहा है
- बनो मत, पहले तो तुम मुझे ये बताओ, तुम्हें मेरा ये नम्बर कहां से मिला ? इस ऑफिस में यह मेरा चौथा ही दिन है औटरतुमने.. ..
- हो गये मैडम के सवाल शुरूपहले तो तुम्हीं बताओ, तब वहां आयी क्यों नहीं थी, मैं पूरे ढाई घंटे इंतज़ार करता रहा थाहमने तयकिया था, वह हमारी आखिरी मुलाकात होगी, इसके बावज़ूद .. ..।
- तुम्हारा बुद्धूपना ज़रा भी कम नहीं हुआअब मुझे इतने बरस बाद याद थोड़े ही है कि कब, कहां और क्यों नहीं आयी थीये बताओ, बोल कहां से रहे हो और कहां रहे इतने दिन
- बाप रे, तुम दिनों की बात कर रही होजनाब, इस बात को बीस बरस बीत चुके हैंपूरे सात हज़ार तीन सौ दिन से भी ज्यादा
- होंगेये बताओ, कैसे हो, कहां हो, कितने हो?
- और ये भी पूछ लो क्यों हो
- नहीं, यह नहीं पूछूंगीमुझे पता है तुम्हारे होने की वज़ह तो तुम्हें खुद भी नहीं मालूम
- बात करने का तुम्हारा तरीका ज़रा भी नहीं बदला
- मैं क्या जानूंये बताओ इतने बरस बाद आज अचानक हमारी याद कैसे गयी? तुमने बताया नहीं, मेरा ये नम्बर कहां से लिया?
- ऐसा है दीप्ति, बेशक मैं तुम्हारे इस महानगर में कभी नहीं रहावैसे बीच बीच में आता रहा हूं, लेकिन मुझें लगातार तुम्हारे बारे मेंपता रहाकहां हो, कैसी हो, कब कब औटर कहां कहां पोस्टिंग रही और कब कब प्रोमोशन हुएबल्कि चाहो तो तुम्हारी सारी फॉरेनट्रिप्स की भी फेहरिस्त सुना दूंतुम्हारे दोनों बच्चों के नाम, कक्षाएं और हाबीज़ तक गिना दूं, बस, यही मत पूछना, केसे खबरें मिलतीरहीं तुम्हारी
- बाप रे, तुम तो युनिवर्सिटी में पढ़ाते थेये इंटैलिजेंस सर्विस कब से ज्वाइन कर ली? कब से चल रही थी हमारी ये जासूसी?
- ये जासूसी नहीं थी डीयर, महज अपनी एक ख़ास दोस्त की तरक्की की सीढ़ियों को और ऊपर जाते देखने की सहज जिज्ञासा थीतुम्हारी हर तरक्की से मेरा सीना थोड़ा और चौड़ा हो जाता था, बल्कि आगे भी होता रहेगा
- लेकिन कभी खोज खबर तो नहीं ली हमारी
- हमेशा चाहता रहाजब भी चाहा, रुकावटें तुम्हारी तरफ से ही रहींबल्कि मैं तो ज़िंदगी भर के लिए तुम्हारी सलामती का कान्ट्रैक्टलेना चाहता था, तुम्हीं पीछे हट गयींतुम्हीं नहीं चाहती थीं कि तुम्हारी खोज खबर लूं, बल्कि टाइम दे कर भी नहीं आती थींकई सालपहले, शायद तुम्हारी पहली ही पोस्टिंग वाले ऑफिस में बधाई देने गया था तो डेढ घंटे तक रिसेप्शन पर बिठाये रखा था तुमने, फिरभी मिलने नहीं आयी थींमुझे ही पता है कितना खराब लगा था मुझे कि मैं अचानक तुम्हारे लिए इतना पराया हो गया कि .. .. तुम्हेंआमने सामने मिल कर इतनी बड़ी सफलता की बधाई भी नहीं दे सकता
- तुम सब कुछ तो जानते थेमैं उन दिनों एक दम नर्वस ब्रेक डाउन की हालत तक जा पहुची थीउन दिनों प्रोबेशन पर थी, एकदमनये माहौल, नयी जिम्मेवारियों से एडजस्ट कर पाने का संकट, घर के तनाव, उधर ससुराल वालों की अकड़ और ऊपर से तुम्हारीहालत, तुम्हारे पागल कर देने वाले बुलावेमैं ही जानती हूं, मैंने शुरू के वे दो एक साल कैसे गुज़ारे थेकितनी मुश्किल से खुद कोसंभाले रहती थी कि किसी भी मोर्चे पर कमज़ोर पड़ जाऊं
- मैं इन्हीं वज़हों से तुमसे मिलना चाहता रहा कि किसी तरह तुम्हारा हौसला बनाये रखूंकुछ बेहतर राह सुझा सकूं और मज़े की बातकि तुम भी इन्हीं वज़हों से मिलने से कतराती रहीआखिर हम दो दोस्तों की तरह तो मिल ही सकते थे
- तुम्हारे चाहने में ही कोई कमी रह गयी होगी
- रहने भी दोउन दिनों हमारे कैलिबर का तुम्हें चाहने वाला शहर भर में नहीं थायह बात उन दिनों तुम भी मानती थीं
- और अब?
- अब भी इम्तहान ले लोइतनी दूर से भी तुम्हारी पूरी खोज खबर रखते हैंदेख लो, बीस बरस बाद ही सही, मिलने आये हैंफोनभी हमीं कर रहे हैं
- लेकिन हो कहां ? मुझे तो तुम्हारी रत्ती भर भी खबर नहीं मिली कभी
- खबरें चाहने से मिला करती हैंवैसे मैं अब भी वहीं, उसी विभाग में वही सब कुछ पढ़ा रहा हूं जहां कभी तुम मेरे साथ पढ़ाया करतीथीकभी आना हुआ उस तरफ तुम्हारा?
- वेसे तो कई बार आयी लेकिन.. ..
- लेकिन हमेशा डरती रही, कहीं मुझसे आमना सामना हो जाये,
- नहीं वो बात नहीं थीदरअसल, मैं किस मुंह से तुम्हारे सामने आतीबाद में भी कई बार लगता रहा, काफी हद तक मैं खुद ही उनसारी स्थितियों की जिम्मेवार थीउस वक्त थोड़ी हिम्मत दिखायी होती तो.. ..।
- तो क्या होता?
- होता क्या, मिस्टर धवन के बच्चों के पोतड़े धोने के बजाये तुम्हारे बच्चों के पोतड़े धोती
- तो क्या ये सारी जद्दोजहद बच्चों के पोतड़े धुलवाने के लिए होती है
- दुनिया भर की शादीशुदा औरतों का अनुभव तो यही कहता है
- तुम्हारा खुद का अनुभव क्या कहता है?
- मैं दुनिया से बाहर तो नहीं
- विश्वास तो नहीं होता कि एक आइ एस अधिकारी को भी बच्चों के पोतड़े धोने पड़ते हैं
- श्रीमान जी, आइ एस हो या आइ पी एस, जब औरत शादी करती है तो उसकी पहली भूमिका बीवी और मां की हो जाती हैउसेपहले यही भूमिकाएं अदा करनी ही होती हैं, तभी ऑफिस के लिए निकल पाती हैतुम्हीं बताओ, अगर तुम्हारे साथ पढ़ाती रहती, मेरामतलब, वहां रहती या तुमसे रिश्ता बन पाता तो क्या इन कामों से मुझे कोई छूट मिल सकती थी
- बिलकुल मैं तुमसे ऐसा कोई काम कराताबताओ, जब तुम मेरे कमरे में आती थी तो कॉफी कौन बनाता था?
- रहने भी दोदो एक बार कॉफी बना कर क्या पिला दी, जैसे ज़िंदगी भर सुनाने के लिए एक किस्सा बना दिया
- अच्छा एक बात बताओ, अभी भी तुम्हारा चश्मा नाक से बार बार सरकता है या टाइट करा लिया है
- नहीं, मेरी नाक अभी भी वैसी ही है, चाहे जितने मंहगे चश्मे खरीदो, फिसलते ही हैं
- पुरानी नकचड़ी जो ठहरी
- बताऊं क्या?
- कसम ले लो, तुम्हारी नाक के नखरे तो जगजाहिर थे
- लेकिन तुम्हारी नाक से तो कम हीजब देखो, गंगा जमुना की अविरल धारा बहती ही रहती थीवैसे तुम्हारे जुकाम का अब क्या हालहै?
- वैसा ही है
- कुछ लेते क्यों नहीं
- तुम्हें पता तो है, दवा लो तो जुकाम सात दिन में जाता है और दवा लो तो एक हफ्ते मेंऐसे में दवा लेने का क्या मतलब
- जनम जात कंजूस ठहरे तुमजुकाम तुम्हारा होता था और रुमाल मेरे शहीद होते थेलगता तो नहीं तुम्हारी कंजूसी में अब भी कोईकमी आयी होगीतुमसे शादी की होती तो मुझे तो भूखा ही मार डालते
- रहने भी दोहमेशा मेरी प्लेट के समोसे भी खा जाया करती थी
- बड़े आये समोसे खिलाने वालेआर्डर खुद देते थे औटर पैसे मुझसे निकलवाते थे
- अच्छा, बाइ वे, क्या तुम्हारी मम्मी ने उस दिन मेरे वापिस आने के बाद वाकई ज़हर खा लिया था या यह सब एक नाटक था, तुम्हें ब्लैकमेल करने कामुझसे तुम्हें दूर रखने का रामबाण उपाय?
- अब छोड़ो उन सारी बातों कोअब तो मम्मी ही नहीं रही हैं इस दुनिया में
- ओह सॉरी, मुझे पता नहीं थाऔर कौन कौन हैं घर में
- तुम तो जासूसी करते रहे होपता ही होगा
- नहीं, वो बात नहीं हैतुम्हारे ही श्रीमुख से सुनना चाहता हूं
- बड़ी लड़की अनन्या का एमबीए का दूसरा साल हैउससे छोटा लड़का है दीपंकरआइआइटी में इंजीनियरिंग कर रहा है
- और मिस्टर धवन कहां हैं आजकल?
- आजकल वर्ल्ड बैंक में डेप्युटेशन पर हैं
- खुश तो हो?
- बेकार सवाल है
- क्यों?
- पहली बात तो, किसी भी शादीशुदा औरत से यह सवाल नहीं पूछा जाता चाहे वह आपके कितनी भी करीब क्यों होऔर दूसरे, शादी के बीस साल बाद इस सवाल का वैसे भी कोई मतलब नहीं रह जातातब हम सुख दुख नहीं देखतेयही देखते हैं कि पति पत्नी नेइस बीच एक दूसरे की अच्छी बुरी आदतों के साथ कितना एडजस्ट करने की आदत डाल ली हैतुम अपनी कहो, क्या तुम्हारी कहानीइससे अलग है?
- कहने लायक है ही कहां मेरे पास कुछ
- क्यों, सुना तो था, मेरी शादी के साल के भर बाद ही शहर के भीड़ भरे बाज़ारों से तुम्हारी भी बारात निकली थी और तुम एक चांद कीप्यारी दुल्हन को ब्याह कर लाये थेकैसी है वो तुम्हारी चद्रमुखी
- अब कहां की चद्रमुखी और कैसी चद्रमुखी
- क्या मतलब?
- मेरी शादी एक बहुत बड़ा हादसा थीसिर्फ दो ढाई महीने चली
- ऐसा क्या हो गया था?
- उसके शादी के पहले से अपने जीजाजी से अफेयर थेउसकी शादी ही इसी सोच के तहत की गयी थी कि उसकी बहन का घर उजड़नेसे बच जायेलेकिन वह शादी के बाद भी छुप छुप कर कर उनसे मिलने उनके शहर जाती रही थीमैंने भी उसे बहुत समझाया था, लेकिन सब बेकारइधर उधर मैंने तलाक की अर्जी दी थी और उधर उसकी दीदी ने खुदकुशी की थीदो परिवार एक ही दिन उजड़े थे
- ओह, मुझे बिलकुल पता नहीं था कि तुम इतने भीषण हादसे से गुज़रे होकहां है वो आजकल
- शुरू शुरू में तो सरेआम जीजा के घर जा बैठी थीबाद में पता चला था, पागल वागल हो गयी थीक्या तुम्हें सचमुच नहीं पता था?
- सच कह रही हूंसिर्फ तुम्हारी शादी की ही खबर मिली थीमुझे अच्छा लगा था कि तुम्हें मेरे बाद बहुत दिन तक अकेला नहीं रहनापड़ा थालेकिन मुझे यह अहसास तक नहीं था कि तुम्हारे साथ यह हादसा भी हो चुका हैफिर घर नहीं बसाया? बच्चे वगैरह?
- मेरे हिस्से में दो ही हादसे लिखे थे प्रेम सफल होगा विवाहतीसरे हादसे की तो लकीरें ही नहीं हैं मेरे हाथ में
- .. .. .. ..
- हैलो
- हुंम.. .. ..।
- चुप क्यों हो गयीं?
- कुछ सोच रही थी
- क्या?
- यही कि कई बार हमें ऐसे गुनाहों की सज़ा क्यों मिलती है जो हमने किये ही नहीं होतेकिसी एक की गलती या ज़िद से कितनेपरिवार टूट बिखर जाते हैं
- जाने दो दीप्ति, अगर ये चीजें मेरे हिस्से में लिखी थीं तो मैं उनसे बच ही कैसे सकता थाखैर, ये बताओ तुमसे मुलाकात हो सकतीहैयूं ही, थोड़ी देर के लिएयूं समझो, तुम्हें अरसे बाद एक बार फिर पहले की तरह जी भर कर देखना चाहता हूं
- नहीं.. ..
- क्यों ?
- नहीं, बस नहीं
- दीप्ति, तुम्हें भी पता है, अब मैं तो तुम्हारी ज़िंदगी में सकता हूं और ही तुम मुझे ले कर किसी भी तरह का मोह या भरम हीपाल सकती होमेरे तो कोई भी भरम कभी थे ही नहींवैसे भी इन सारी चीज़ों से अरसा पहले बहुत ऊपर उठ चुका हूं
- शायद इसी वज़ह से मैं मिलना चाहूं
- क्या हम दो परिचितों की तरह एक कप काफी के लिए भी नहीं मिल सकते
- नहीं
- इसकी वज़ह जान सकता हूं
- मुझे पता है और शायद तुम भी जानते हो, हम आज भी सिर्फ दो दोस्तों की तरह नहीं मिल पायेंगेहो ही नहीं पायेगायह एक बारमिल कर सिर्फ एक कप कॉफी पीना ही नहीं होगामैं तुम्हें अच्छी तरह से जानती हूंतुम बेशक अपने आप को संभाल ले जाओ, इतनेबड़े हादसे से खुद को इतने बरसों से हुए ही होलेकिन मैं आज भी बहुत कमज़ोर पड़ जाउंगीखुद को संभालना मेरे लिए हमेशा बहुतमुश्किल होता है
- मैं तुम्हें कत्तई कमज़ोर नहीं पड़ने दूंगा
- यही तो मैं नहीं चाहती कि मुझे खुद को संभालने के लिए तुम्हारे कंधे की ज़रूरत पड़े
- अगर मैं बिना बताये सीधे ही तुम्हारे ऑफिस में चला आता तो?
- हमारे ऑफिस में पहले रिसेप्शन पर अपना नाम पता और आने का मकसद बताना पड़ता हैफिर हमसे पूछा जाता है कि मुलाकातीको अंदर आने देना है या नहीं
- ठीक भी हैआप ठहरी इतने बड़े मंत्रालय में संयुक्त सचिव के रुतबे वाली वरिष्ठ अधिकारी और मैं ठहरा एक फटीचर मास्टरअब हरकोई ऐरा गैरा तो .. .।
- बस करो प्लीजमुझे गलत मत समझोइसमें कुछ भी ऑफिशियल नहीं हैऐसा नहीं है कि मैंने इस बीच तुम्हें याद किया होया तुम्हें मिस किया होबल्कि मेरी ज़िंदगी का एक बेहतरीन दौर तुम्हारे साथ ही गुज़रा हैज़िंदगी के सबसे अर्थपूर्ण दिन तो शायदवही रहे थेआइएएस की तैयारियों से लेकर नितांत अकेलेपन के पलों में मैंने हमेशा तुम्हें अपने आस पास पाया थासच कहूं तो अबभी मैं तुमसे कहीं कहीं जुड़ाव महसूस करती हूं, बेशक उसे कोई नाम दे पाऊं या उसे फिर से जोड़ने, जीने की हिम्मत जुटापाऊंसंस्कार इज़ाजत नहीं देंगेहैलो .. ... सुन रहे हो ?
- हां हां .. .. बोलती चलो
- लेकिन अब इतने बरसों के बाद इस तरह मैं तुम्हारा सामना नहीं कर पाउंगीमुझे समझने की कोशिश करो प्लीज़
- ठीक है नहीं मिलतेआमने सामने सही, तुम्हें दूर पास से देखने का तो हक है मुझेमैं भी जरा देखूं, तुम्हारा चश्मा अब भीफिसलता क्यों हैपहले की तरह उसे ऊपर बेशक कर पाऊं, कम से कम देख तो लूंऔर हमारी दोस्त ज्वांइट सेक्रेटरी बनने के बादकैसे लगती है, यह भी तो देखें
- कम से कम सिर पर सींग तो नहीं होते उनके
- देखने मैं क्या हर्ज़ है?
- जब मुझे सचमुच तुम्हारी ज़रूरत थी या तुम्हें कैसे भी करके मिलने आना चाहिये था तब तो तुमने कभी परवाह नहीं की और अब.. ..।
- इस बात को जाने दो कि मैं मिलने के लिए सचमुच सीरियस था या नहीं, सच तो यह है कि एक बार तुम्हारी शादी यह तय हो जानेके बाद तुमने खुद ही तो एक झटके से सारे संबंध काट लिये थे
- झूठ मत बोलो, मैं शादी के बाद भी तुमसे मिलने आयी थी
- हां, अपना मंगल सूत्र और शादी की चूड़ियां दिखाने कि अब मैं तुम्हारी दीप्ति नहीं मिसेज धवन हूंकिसी और की ब्याहता
- मुझे गाली तो मत दोतुम्हें सब कुछ पता तो था और तुमने सब कुछ ज्यों का त्यों स्वीकार कर भी कर लिया था जैसे मैं तुम्हारेलिए कुछ थी ही नहीं
- स्वीकार करता तो क्या करतामेरे प्रस्ताव के जवाब में तुम्हारी मम्मी का ज़हर खाने का वो नाटक और तुम्हारा एकदम सरंडर करदेना, मेरा तो क्या, किसी का भी दिल पिघला देता
- तुम एक बार तो अपनी मर्दानगी दिखातेमैं भी कह सकती कि मेरा चयन गलत नहीं है
- क्या फिल्मी स्टाइल में तुम्हारा अपहरण करता या मजनूं की तरह तुम्हारी चौखट पर सिर पटक पटक कर जान दे देता
- अब तुम ये गड़े मुरदे कहां से खोदने लग गयेक्या बीस बरस बात यही सब याद दिलाने के लिए फोन किया है
- मेरी ऐसी कोई इच्छा नहीं थीतुम्हीं ने.. ..।
- तुम कोई और बात भी तो कर सकते हो
- करने को तो इतनी बातें हैं, बीस बरस पहले की, बीस बरस के दौरान की और अब की लेकिन कितना अच्छा लगता, आमने सामनेबैठ कर बात कर सकतेलेकिन मैं उसके लिए तुम्हें मज़बूर नहीं करूंगा
- ज़िद मत करोअब मैं सिर्फ़ तुम्हारी दीप्ति ही तो नहीं हूंसारी बातें .. देखनी.. ..
- तो फिर ठीक हैसी यू सूनरखता हूं फोन
- मिलने के ख्वाब तो छोड़ ही दो श्रीमानएनी वे, सो नाइस ऑफ यू फार कॉलिंग ऑफ्टर सच एं लाँग पीरियडइट वाज प्लीजेंटसरप्राइज़तुमसे बातें करते करते वक्त का पता ही नहीं चलामुझे अभी एक अर्जेंट मीटिंग में जाना हैउसके पेपर्स भी देखने हैंलेकिन तुम तो कह रहे थे, एक रुपये का और सिक्का नहीं है तुम्हारे पासपिछले बीस मिनट से तुम पीसीओ से तो बात नहीं कर रहेवैसे बोल कहां से रहे हो
- उसे जाने दोवैसे मुझे भी एक अर्जेंट मीटिंग के लिए निकलना है
- तो क्या किसी मीटिंग के सिलसिले में आये हो यहां?
- हां, आया तो उसी के लिए थासोचा इस बहाने तुमसे भी . ..।
- कहां है तुम्हारी मीटिंग?
- ठीक उसी जगह जहां तुम्हारी मीटिंग है
- क्या मतलब?
- मतलब साफ है डीयर, तुम्हारे ही विभाग ने हमारी युनिवर्सिटी के नॉन कॉनवेन्शनल एनर्जी रिसोर्सेज के प्रोजैक्ट पर बात करने केलिए हमारी टीम को बुलवाया हैइसमें महत्वपूर्ण खबर सिर्फ इतनी ही है कि यह प्रोजैक्ट मेरे ही अधीन चल रहा हैयह तो यहीं आकरपता चला कि अब तुम ही इस केस को डील करोगी और.. .. .. ।
- ओह गॉडआइ जस्ट कांट बिलीवअब क्या होगातुमने पहले क्यों नहीं बतायाइतनी देर से मुझे बुद्धू बना रहे थे और.. ..।
- रिलैक्स डीयर, रिलैक्सतुम्हें बिलकुल भी परेशान होने की ज़रूरत नहीं हैमैं वहां यही जतलाउंगा, तुमसे ज़िंदगी में पहली औरआखिरी बार मिल रहा हूंबस, एक ही बात का ख्याल रखना, अपना चश्मा टाइट करके ही मीटिंग में आना
- यू चीट.. ..।